70 दिन की पीड़ा, 3 घंटे का समाधान: हजारीबाग में सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर

 प्रस्तुति:  ✍रंजन चौधरी, सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग संसदीय क्षेत्र ।



जब सिस्टम 'मर' जाए और संवेदनाएं 'दफन' हो जाएं, तो बस  'आह' निकलती है...

हाकिमों की मेज़ पर फाइलें दम तोड़ती रहीं,

एक बाप की उम्मीदें चौखटों पर भटकती रहीं,

जब तक सत्ता की डाँट ने न जगाया उन्हें,

इंसानियत ब्लॉक के दफ्तरों में सोती रही...।

झारखंड राज्य में सरकारी तंत्र का वर्तमान समय में कुछ ऐसा ही हाल है। झारखंड की प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता क्या इतनी गिर चुकी है कि एक करीब 70 साल के बुजुर्ग पिता को अपने युवा पुत्र के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए करीब 70 दिनों तक दफ्तरों की खाक छाननी पड़े? उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल मुख्यालय हजारीबाग जिले के डाड़ी प्रखंड कार्यालय से सामने आई यह घटना न केवल शर्मनाक है, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के गाल पर एक जोरदार तमाचा भी है।

घटना के केंद्र में गिद्दी-ए निवासी सियाराम सिंह हैं, जिन्होंने बसरिया, डाड़ी में बीते 16 फरवरी 2026 को हुई एक सड़क दुर्घटना में अपने 34 वर्षीय पुत्र गौरव कुमार को खो दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख और क्या होगा कि उसे अपने जवान बेटे की अर्थी को कंधा देना पड़ा। लेकिन दुख की इस घड़ी में संबल बनने के बजाय, सरकारी मशीनरी उनके लिए प्रताड़ना का केंद्र बन गई। सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बावजूद, करीब 70दिनों तक उन्हें ब्लॉक के चक्कर कटवाए गए। क्या यह वही 'लोकतंत्र' है जहाँ सरकारें जनता की सेवा का दम भरती हैं?

हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र के सांसद मनीष जायसवाल के हस्तक्षेप के बाद जो तस्वीर सामने आई, वह भयावह है। प्रखंड कार्यालय में वरीय अधिकारियों की अनुपस्थिति, सन्नाटा और बीडीओ द्वारा जनप्रतिनिधि का फोन तक न उठाना यह दर्शाता है कि अफसरशाही किस कदर बेलगाम हो चुकी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो काम महज 3 घंटे में सांसद मनीष जायसवाल के एक फटकार से हो सकता था, वह करीब 70 दिनों तक क्यों अटका रहा? क्या ब्लॉक के बाबू किसी 'सुविधा शुल्क' के इंतजार में थे या वे बुजुर्गों की लाचारी देख कर आनंदित हो रहे थे?

सांसद मनीष जायसवाल का स्वयं ब्लॉक पहुंचना और 24 घंटे का अल्टीमेटम देना एक सराहनीय कदम है। उनके कड़े रुख के कारण ही महज 3 घंटे के भीतर पीड़ित परिवार को व्हाट्सएप के जरिए प्रमाण पत्र मिल सका। लेकिन यह समाधान 'स्थायी' नहीं है। हर नागरिक के पास सांसद तक पहुंचने का जरिया नहीं होता और न ही सांसद हर छोटे काम के लिए हर ब्लॉक में मौजूद रह सकते हैं। यह घटना स्पष्ट करती है कि झारखंड की वर्तमान शासन व्यवस्था में 'रिश्वतखोरी और निकम्मापन' शिष्टाचार बन चुका है।

सांसद मनीष जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि वे चुप नहीं बैठेंगे, लेकिन सवाल अब झारखंड की सरकार और वरीय अधिकारियों से है। क्या उन बाबुओं और जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज गिरेगी जिन्होंने एक शोकाकुल पिता को अपमानित किया? क्या बीडीओ की कार्यशैली की जांच होगी?

अगर एक मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी किसी जनप्रतिनिधि को धरने पर बैठने की चेतावनी देनी पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि सरकारी तंत्र आईसीयू  में है। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहती है। आज जरूरत इस बात की है कि ऐसे लापरवाह कर्मचारियों को बर्खास्त किया जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य 'सियाराम सिंह' को अपने हक के लिए दर-दर न भटकना पड़े। जब तक सरकारी सिस्टम में बैठे लोग स्वयं को 'लोक सेवक' नहीं समझेंगे, तब तक जनता इसी तरह फाइलों के बीच पिसती रहेगी।

कुर्सी का गुरूर नहीं, सेवा का संकल्प महान होना चाहिए,

तुम्हारी कलम की स्याही में गरीब का सम्मान होना चाहिए,

मत भूल कि तू भी इसी अवाम का एक हिस्सा है,

अधिकारी वही श्रेष्ठ है, जिसका आचरण इंसान होना चाहिए...।