चंदनकियारी में तीन सदियों से जीवित है दुर्गा पूजा की विरासत, बंगाल की परंपरा, मानभूम की स्मृति और आदिवासी संस्कृति का अनूठा संगम

 यह जानकारी स्थानीय बुजुर्गों से प्राप्त सूचनाओं और प्रचलित लोककथाओं पर आधारित है।

प्रस्तुति: रंजन चौधरी,

सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र।

सरल भाषा में प्रस्तुति: Pintu Kumar


झारखंड के बोकारो जिले का चंदनकियारी क्षेत्र इतिहास, लोकआस्था और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की जीवंत विरासत है। यहां बंगाल की धार्मिक परंपराएं, मानभूम की ऐतिहासिक स्मृतियां और झारखंड की जनजातीय संस्कृति एक-दूसरे में घुली-मिली दिखाई देती हैं। यहां दुर्गा पूजा केवल वार्षिक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह कई पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, पारिवारिक स्मृति, सामुदायिक सहभागिता और लोकजीवन की निरंतरता का उत्सव है।

यह क्षेत्र झारखंड के बोकारो और धनबाद जिलों तथा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला मुख्यालय से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐतिहासिक रूप से यह मानभूम की सांस्कृतिक परिधि से जुड़ा रहा है। काशीपुर राजपरिवार की जमींदारी विरासत और बंगाली सांस्कृतिक प्रभाव ने यहां की धार्मिक परंपराओं को विशिष्ट पहचान दी है। स्थानीय मान्यताओं और प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यहां दुर्गा पूजा की परंपरा तीन सौ वर्ष से भी अधिक पुरानी मानी जाती है।

लोकस्मृतियों में जीवित विरासत

चंदनकियारी की दुर्गा पूजा का इतिहास किसी एक राजपरिवार, मंदिर या पूजा मंडप तक सीमित नहीं है। यह अनेक गांवों, परिवारों और समुदायों में बिखरी स्मृतियों का समुच्चय है। स्थानीय परंपराओं में काशीपुर राजपरिवार का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। मान्यता है कि राजपरिवार के संरक्षण और प्रभाव से इस अंचल में पूजा की परंपरा को प्रोत्साहन मिला। कुछ स्थानों पर पूजा राजकीय अथवा जमींदारी विरासत से जुड़ी रही, तो कहीं परिवारों ने अपने जीवन की घटनाओं और व्यक्तिगत आस्था को पूजा की शुरुआत का आधार बनाया।

तीन पूजा पद्धतियां

क्षेत्र में लंबे समय से पूजा करा रहे ग्राम गुंडरी निवासी पुजारी रुद्र पांडेय के अनुसार यहां मुख्य रूप से तीन पूजा पद्धतियां प्रचलित हैं: वैष्णवी, तामसिक और राजसिक।

वैष्णवी पूजा सात्त्विक उपासना का स्वरूप है, जिसमें शुद्धता, संयम, पवित्रता और धार्मिक अनुष्ठानों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसमें बलि के स्थान पर सात्त्विक भोग और पारंपरिक विधि-विधान प्रमुख होते हैं।

तामसिक पूजा में कुछ स्थानों पर पारंपरिक बलि प्रथा का विधान मिलता है। इसका स्वरूप स्थानीय परंपराओं और संबंधित पूजा परिवारों की मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। कहीं खीरा, कोहड़ा और गन्ने की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है, तो कहीं पशुबलि की परंपरा भी प्रचलित रही है।

राजसिक पूजा में देवी को आभूषण, गहने और धनराशि अर्पित करने की परंपरा उल्लेखनीय है। रुद्र पांडेय के अनुसार काशीपुर राजपरिवार में लगभग चार शताब्दी पहले से राजसिक पूजा किए जाने की स्थानीय परंपरा का उल्लेख मिलता है। कुछ गांवों में श्रद्धालु आज भी देवी को आभूषण और अन्य मूल्यवान वस्तुएं अर्पित करते हैं।

इन तीनों पद्धतियों का सह-अस्तित्व बताता है कि आस्था का कोई एक रूप नहीं होता। एक ही देवी की आराधना अलग-अलग समुदायों और परिवारों में अलग-अलग विधियों से होती है, फिर भी सबका भावनात्मक केंद्र एक ही रहता है: मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण।

पुजारी रुद्र पांडेय के अनुसार मंदिरों के साथ-साथ घरों में भी दुर्गा नवमी पर पुरोहितों के माध्यम से पूजा कराने की परंपरा रही है। कई परिवार तुलसी पिंडा के निकट अपने पारंपरिक दुर्गा पूजा अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। समय के साथ कुछ स्थानों पर पूजा विधियों में बदलाव आया है, लेकिन अनेक परिवार आज भी पुरानी परंपराओं को यथासंभव बनाए रखने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार यहां पूजा के मूल मंत्र संस्कृत के ही होते हैं, लेकिन अधिकतर स्थानों पर उनका उच्चारण बांग्ला भाषा की ध्वनि शैली में सुनाई देता है। पुरानी पीढ़ी के पुरोहित आज भी संस्कृत मंत्रों के साथ बांग्ला में संकल्प, निर्देश और स्तुति करते हैं, जबकि नई पीढ़ी के पुरोहित संस्कृत या हिंदी में पूजा कराते हैं।

माढ़रा का घोष परिवार

बाबा भैरव नाथ के प्रभाव वाले क्षेत्र, यानी माढ़रा गांव की दुर्गा पूजा का अपना विशिष्ट स्थान है। स्थानीय विवरणों के अनुसार यहां घोष परिवार की पूजा लगभग ढाई सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है। पूर्ववर्ती जमींदार रासबिहारी घोष के परिवार से जुड़ी लोककथा इसकी भावनात्मक पृष्ठभूमि बताती है। कहा जाता है कि उनके पुत्र निरंजन बचपन में गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। उस कठिन समय में उनकी मां ने मां दुर्गा से पुत्र के स्वस्थ होने की प्रार्थना की। निरंजन के स्वस्थ होने के बाद परिवार ने कृतज्ञता में पूजा की परंपरा आरंभ की। घोष परिवार की अनेक पुरानी स्मृतियां आज भी यहां विद्यमान हैं।

इसी प्रकार चंदनकियारी नीचे बाजार की दुर्गा पूजा को भी दो शताब्दी से अधिक पुरानी परंपरा बताया जाता है। पूर्व मंत्री एवं पूर्व विधायक अमर कुमार बाउरी के अनुसार यहां बंगाली परंपरा की ऐतिहासिक छाप आज भी स्पष्ट दिखाई देती है।

छऊ मुखौटों की झलक और प्रतिमा शिल्प

यहां की प्रतिमा निर्माण परंपरा भी आकर्षक है। कुछ प्रतिमाओं के चेहरे की बनावट, भाव-भंगिमाओं और सज्जा में छऊ नृत्य के मुखौटों की याद दिलाने वाला शिल्प दिखाई देता है। यह इस क्षेत्र की व्यापक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की ओर संकेत करता है, जहां धार्मिक कला और लोकनृत्य की परंपराएं साथ-साथ विकसित हुई हैं। छऊ नृत्य भारत की उन विशिष्ट नृत्य परंपराओं में है, जिन्हें यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में स्थान मिला है। मानभूम से जुड़ी पुरुलिया छऊ परंपरा अपने विशिष्ट मुखौटों, ऊर्जावान मुद्राओं और पौराणिक आख्यानों के मंचन के लिए जानी जाती है। इस क्षेत्र की प्रतिमाएं स्थानीय कुम्हार परिवारों के कौशल, पीढ़ियों से अर्जित शिल्पज्ञान और सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति भी हैं।

जब पूरा गांव बन जाता है सहभागी

यहां की दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामुदायिक प्रकृति है। ब्राह्मण परिवारों के पुरोहित अनुष्ठान संपन्न कराते हैं, कुम्हार परिवारों के कारीगर प्रतिमाएं तैयार करते हैं, कालिंदी परिवार ढाक वादक के रूप में पारंपरिक लय भरते हैं और बाउरी परिवार सहित अनेक परिवारों के लोग प्रतिमा को कंधे पर उठाकर तालाब या नदी तक विसर्जन के लिए ले जाते हैं। हालांकि अब ट्रैक्टर और गाड़ियों से भी विसर्जन होने लगा है।

कई गांवों में पूजा का आयोजन सामूहिक ग्रामीण व्यवस्था के माध्यम से होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर सोलहआना कहा जाता है। कुछ स्थानों पर पारिवारिक पूजा की परंपरा प्रमुख है। अनेक गांवों में पुराने दुर्गा मंडप आज भी दिखाई देते हैं। कई मंडपों के बाहर बलि के लिए अलग स्थान बने हैं, जबकि कुछ मंदिरों में सात्त्विक पूजा की परंपरा है। ग्रामीण इन स्थलों पर वर्षभर पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। जातीय और सामाजिक विविधता के बावजूद एक साझा धार्मिक आयोजन के लिए लोगों का जुटना उल्लेखनीय है।

बंगाली बहुल गांवों का उत्सव

चंदनकियारी पूर्वी और पश्चिमी, रंगामटिया, माढ़रा, लक्षणपुर, मानपुर, देवग्राम, आसनसोल, आद्रकुड़ी, घाघरी, लंका, गंभरिया, बोरियाडीह, अमायनगर, वर्षावाद, मयूरडूब और चंद्रा जैसे गांवों में पूजा के समय विशेष चहल-पहल रहती है। घरों की सफाई, मंडप की सजावट, प्रतिमा निर्माण, वाद्ययंत्रों की तैयारी और रिश्तेदारों के आगमन से कई दिन पहले ही उत्सव का माहौल बन जाता है। देश-विदेश में रहने वाले अनेक लोग इस अवसर पर अपने गांव लौटते हैं। वर्षों से दूर रह रहे परिजन जब पुश्तैनी घरों में जुटते हैं, तो पूजा परिवार, जड़ों और अपनी मिट्टी से दोबारा जुड़ने का अवसर बन जाती है।

महालया से विजयादशमी तक

कई स्थानों पर महालया से ही पूजा का वातावरण बनने लगता है। इसके बाद बेलबरन, पट पूजा और अन्य पारंपरिक विधियों के साथ उत्सव आगे बढ़ता है। मंडपों में सुबह-शाम आरती होती है। एक अनूठी स्थानीय परंपरा में श्रद्धालु नई बांस की टोकरी में दीप लेकर मां के दरबार में जाते हैं, देवी के सामने दीप अर्पित करते हैं और फिर उसे लेकर घर लौटते हैं। कुछ स्थानों पर धुनुची या धुनि नृत्य भी देखने को मिलता है, और बंगाली बहुल गांवों में सिंदूर खेला विशेष आकर्षण है।

नवमी, दशमी और एकादशी को अलग-अलग गांवों में स्थानीय परंपरा के अनुसार मेले लगते हैं। छऊ नृत्य, बाउल गायन, झूमर, जागरण और अन्य लोक प्रस्तुतियां पूजा को व्यापक सांस्कृतिक उत्सव का रूप देती हैं और स्थानीय कलाकारों को अपनी परंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।

विजयादशमी के दिन कई परिवारों में पहले देवी के मंदिर में माथा टेका जाता है और फिर बुजुर्गों के घर जाकर आशीर्वाद लिया जाता है। विसर्जन के समय ढाक की थाप पर लोग झूमते-गाते आगे बढ़ते हैं और "अगले बरस फिर आना मां" की भावना के साथ घर लौटते हैं। यह विदाई विरह के साथ अगले वर्ष पुनर्मिलन की आशा भी समेटे रहती है।

माझी नाच और ढाक में आदिवासी परंपरा

इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को केवल बंगाली प्रभाव से समझना अधूरा होगा। यहां के आदिवासी समाज की परंपराएं भी उत्सवी जीवन को विशिष्ट बनाती हैं। संथाल लाघला, चंदनकियारी में संथाल लाघला, मुल्लुडीह, बांसगाड़ी, खेखरीडीह, हड़इकुरवा, आसनसोल और कदुआबिठा सहित अन्य गांवों के संथाल समाज के लोगों का पूजा की सांस्कृतिक परंपरा में विशेष योगदान रहता है। माझी नाच, पारंपरिक ढाक वादन और अन्य लोककलाएं बताती हैं कि पूजा का सामाजिक संसार अनेक सांस्कृतिक धाराओं के मेल से बना है। इनकी भागीदारी को केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता और सामुदायिक उपस्थिति के रूप में समझा जाना चाहिए।

बदलता स्वरूप, कायम आस्था

समय के साथ यहां दुर्गा पूजा का प्रचलन बढ़ा है। कई नए स्थानों पर लोग नए मंदिर बनाकर या टेंट-पंडाल लगाकर पूजा करते हैं और क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति को आगे बढ़ाने का सकारात्मक प्रयास करते हैं। कई जगहों पर आकर्षक बिजली सज्जा और तेज़ संगीत वाले साउंड सिस्टम का चलन भी नई पीढ़ी की पसंद में शामिल है। इसके बावजूद पुराने मानभूम से आज के चंदनकियारी तक दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवंत है। स्थानीय टोलियां झाल, मांदर और ढोल के साथ कीर्तन, भजन संध्या और जागरण करती हैं। ढाक की थाप के साथ ही लोगों के मन में मां दुर्गा की आस्था धड़कने लगती है और पूरा क्षेत्र भक्ति में डूब जाता है।