आधुनिक युग में जहां पाश्चात्य संस्कृति हावी है वही समाज में मानवीय वेदना, संवेदना और इंसानियत के भाव का भी आभाव दिखता है। हजारीबाग जिसे अमन-चैन और सौहार्दपूर्ण वातावरण के लिए जाना जाता रहा है लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं घटती है जो इस सामाजिक सौहार्द के लिए भविष्य में चिंता का सबब बन जाती है।
ताजा उदाहरण है हजारीबाग शहर और आसपास के विभिन्न थाना क्षेत्रों से बीते एक सप्ताह के दौरान 7 शव लावारिश अवस्था में बरामद हुए। इन घटनाओं ने पूरे हजारीबाग को झकझोर कर रख दिया है। सबसे अधिक चिंतनीय बात यह है कि इनमें से 5 शव अब भी अज्ञात है और उनके पहचान के लिए शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में मोर्चुरी पर रखा गया है। अबतक इनकी पहचान नहीं हो सकी है। पुलिसिया जाँच के साथ ये समाज के सामने एक अत्यंत ही गंभीर और ज्वलंत सामाजिक प्रश्न खड़े करता है कि आखिर इन शवों का पहचान हो पाएगा भी या नहीं? या कई लावारिश शवों की तरह ही इनका भी अंतिम संस्कार हो जाएगा और ये काल के गाल में हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे ।
ऐसे इन सभी शवों को पुलिस की मौजूदगी में मुक्तिधाम सेवा संस्थान के सचिव सह वार्ड पार्षद प्रतिनिधि नीरज कुमार ने बड़े मशक्कत के बाद सम्मानपूर्वक उठाकर फिलवक्त पहचान के लिए रखवाया है। हीराबाग चौक के समीप गहरे दलदल के एक नाली से एक शव को निकालने के क्रम में वे हादसा के शिकार भी हो सकते थे लेकिन उन्होंने डंडे के सहारे पहले दलदल की गहराई नापी फिर शव को निकाला। ऐसे कई दिनों से पड़े शवों के दुर्गंध को सहकर उन्होंने इस सेवा क्षेत्र में जो मिसाल पेश किया है वह सराहनीय है। नीरज कुमार और उनकी टीम का कार्य निसंदेह मानवीय संवेदनाओं का उत्कृष्ट उदाहरण है। जब सबों की पहचान नहीं हो पाएगी तब इनके द्वारा ही सम्मानपूर्वक इनका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि इनका अंतिम संस्कार करके क्या हम अपने सामाजिक दायित्व से मुक्त हो सकते हैं? या फिर हमें उन कारणों की तलाश भी करनी चाहिए, जिसकी वजह से लोग इस स्थिति तक पहुंच रहे हैं?
हजारीबाग में पिछले एक सप्ताह के दौरान इन शवों की लावारिश हालत में झील के मत्स्य विभाग के समीप से मिलना, हीराबाग स्थित बिजली विभाग के सामने के नाले से मिलना, नगवां- चुरचू के पत्थर एक माइंस से मिलना, रेलवे स्टेशन के बोगी से मिलना तो रहस्यमय है ही लेकिन शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के भीतर से दो शवों का बरामद होना बेहद ही चिंतनीय और गंभीर सवाल खड़ा करता है। यहां लोग जीवन बचाने की आस लेकर पहुंचते हैं लेकिन बीते एक सप्ताह के भीतर वार्ड से एक शव और एक शव ट्रामा सेंटर के बाहर से बरामद होना व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता दोनों पर सवाल खड़े करती है।
वर्तमान समाज में मानसिक तनाव, अवसाद, आर्थिक दबाव, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और आपसी विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। कई बार लोग किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को देखकर मुँह मोड़ लेते हैं तो कई बार अस्पताल के बाहर छोड़कर चंपत हो जाते हैं। ऐसे लोग कौन हैं? उनकी जिम्मेवारी कैसे तय होगी और कौन तय करेगा? क्या हमारी संवेदनाएं इतनी कमजोर हो गई है कि हम किसी जरूरतमंद को मदद नहीं कर सके या किसी जरूरतमंद को अस्पताल पहुंचाकर यहां भर्ती कराने या उसके परिजनों तक सूचना पहुंचाने का भी प्रयास नहीं कर सकते?
अब समय सिर्फ शासन- प्रशासन को दोष देने का नहीं है। समाज को ऐसे विषयों पर सामाजिक रूप से मिलकर चिंतक- मंथन करना होगा। हमें आत्म मंथन करना होगा। परिवारों में संवाद कम हो रहे हैं, सामाजिक रिश्ते कमजोर पड़ रहे हैं और अकेलापन बढ़ता जा रहा है। मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की जरूरत है। समाज में नशा मुक्ति अभियान को सामाजिक आंदोलन बनाना होगा। मानसिक अवसाद में जीने वाले लोगों को सामाजिक रूप से संबल देने की आवश्यकता है। हम सभी को अपने अंदर संवेदना के भाव को जागृत रखना होगा और इसे मानवीय कर्तव्य समझकर इसे अपने दैनिक जीवन में चरितार्थ करना होगा ।
प्रशासन को भी शहर के ऐसे सुनसान जगहों के साथ-साथ अस्पताल जैसे संवेदनशील जगहों पर सीसीटीवी निगरानी रखनी होगी ताकि बेसहारा एवं अज्ञात लोगों की पहचान और पुनर्वास की व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सके। राजनीतिक और सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवकों और आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ईमानदारी पूर्वक करना होगा।
हजारीबाग अपनी सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदना के लिए जाना जाता रहा है। ऐसी असामाजिक और अमानवीय घटनाओं पर अगर इसे महज खबर समझकर इग्नोर करते रहें तो भविष्य में यह स्थिति और व्यापक हो सकती है। लावारिस अवस्था में मिले इन शवों की भी अपनी मौत की कहानी होते हैं जो समाज की असंवेदनाओं, व्यवस्था की कमियों और टूटते सामाजिक रिश्तों का मौन आईना होते है। पिछले एक सप्ताह में हजारीबाग में मिले इन शवों में से कई शवों को करीब से देखा तो यह एहसास मन में हुआ कि इसे शेयर किया जाय और इस पर सामाजिक रूप से चर्चा की जरूरत है अन्यथा आने वाले समय में हम इंसान तो होंगे लेकिन समाज में वेदना, संवेदना और इंसानियत का भाव का घोर आभाव हो जायेगा और हम इंसान और जानवरों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।
✍️ रंजन चौधरी,
सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग संसदीय क्षेत्र।
