प्रस्तुति:- ✍️ रंजन चौधरी,
सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग हजारीबाग क्षेत्र।
आज मातृ दिवस है। हर ओर मां की ममता, त्याग और प्रेम के गुणगान हो रहे हैं, लेकिन समाज के उस मौन संघर्ष की ओर बहुत कम लोगों की नजर जाती है, जहां हर दिन एक मां अपने बच्चे की एक-एक सांस के लिए मौत से लड़ती है।
हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र में सांसद मीडिया प्रतिनिधि के रूप में सांसद Manish Jaiswal का एक सिपाही बनकर अपनी सेवा देते हुए और अस्पताल की चौखट पर खड़े होकर मैंने उन सैकड़ों माताओं के दर्द को महसूस किया है, जिनकी दुनिया हीमोफिलिया और थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारियों के इर्द-गिर्द सिमट गई है।
Shaheed Nirmal Mahto Medical College and Hospital के डे केयर यूनिट और ब्लड बैंक पर निर्भर करीब सवा तीन सौ बच्चों का जीवन जिस संजीवनी के भरोसे टिका है, वह कोई दवा नहीं, बल्कि उनकी मां की अटूट हिम्मत और संघर्ष है। उनका यह संघर्ष केवल बीमारी से नहीं, बल्कि गरीबी, सामाजिक तानों और व्यवस्था की खामियों के खिलाफ भी है।
हीमोफिलिया से ग्रसित बच्चे की मां का जीवन किसी कांच के महल की रक्षा करने जैसा होता है। जहां एक सामान्य बच्चा गिरता है तो मां उसे प्यार से सहलाकर खड़ा कर देती है, वहीं इन माताओं के लिए बच्चे की एक मामूली खरोंच भी कयामत बन जाती है। आंतरिक रक्तस्राव के कारण जब बच्चे के जोड़ों में असहनीय दर्द होता है और वह बिलख उठता है, तब एक मां न केवल उसे संभालती है, बल्कि अपने आंसुओं को छिपाकर खुद उसके नसों में फैक्टर इंजेक्शन लगाना भी सीख जाती है।
अपने ही बच्चे के शरीर में बार-बार सुई चुभाना एक मां के लिए कितना पीड़ादायक होता होगा, इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है। विडंबना यह है कि कैरियर होने के कारण कई बार समाज और कभी-कभी उसका अपना मन भी उसे ही बीमारी का दोषी ठहराने लगता है, लेकिन वह मां हर मानसिक बेड़ी को तोड़कर अपने बच्चे के लिए ढाल बन जाती है। कई बार सामाजिक और पारिवारिक उपेक्षा का दंश भी उन्हें झेलना पड़ता है।
इसी तरह थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की माताओं के लिए अस्पताल का ब्लड बैंक ही उनका दूसरा घर बन जाता है। तपती धूप हो या कड़कड़ाती ठंड, मूसलाधार बारिश हो या आंधी-तूफान — सुदूर गांवों से अपने बच्चे को गोद में लेकर शहर पहुंचना और समय पर रक्त की व्यवस्था करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। कई बार वे अपने दूसरे छोटे बच्चों को भी साथ लेकर अस्पताल के फर्श पर भूखी-प्यासी बैठी रहती हैं, ताकि उनके पीड़ित बच्चे को समय पर खून मिल सके।
इन माताओं के दर्द को समझते हुए सांसद Manish Jaiswal ने अपने विधायक कार्यकाल में झारखंड विधानसभा से लेकर सड़क तक इनकी आवाज बुलंद की। उसी प्रयास का परिणाम है कि आज हजारीबाग में डे केयर यूनिट की स्थापना हो सकी और ब्लड सेपरेशन जैसी सुविधाओं के विस्तार के लिए उनका प्रयास निरंतर जारी है। ब्लड बैंक में बीटी सेट मुफ्त उपलब्ध कराना और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना दरअसल उन माताओं के आंसुओं को पोंछने की दिशा में एक संवेदनशील पहल है।
हाल ही में सांसद Manish Jaiswal ने हीमोफिलिया पीड़ित बच्चों की माताओं से मिलकर उनकी समस्याओं को कम करने और हरसंभव राहत पहुंचाने का विश्वास भी दिलाया है।
आज का दिन केवल शुभकामनाएं देने का नहीं, बल्कि इन माताओं की दिलेरी, त्याग और जज्बे को नमन करने का है। समाज के स्वैच्छिक रक्तदाता भी इन परिवारों के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं, जो एक पुकार पर रक्तदान कर उस मां की उम्मीदों को जिंदा रखते हैं।
हीमोफिलिया और थैलेसीमिया से लड़ रहे बच्चों के लिए उनकी मां किसी वरदान से कम नहीं। जीवन के सबसे कठिन संघर्ष के बीच भी वे अपने बच्चों को ममता की छांव देती हैं और यह संदेश देती हैं कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, मां कभी हार नहीं मानती।
ऐसी सभी संघर्षशील, साहसी और वीर माताओं के मातृत्व प्रेम और अदम्य साहस को मेरा सादर नमन।

