प्रस्तुति: ✍ रंजन चौधरी, सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र ।
आकाशवाणी हो या धरातल, हर ओर नारी को शक्ति का रूप मानकर पूजने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। चैत्र नवरात्रि की नवमी की सुबह जब पूरा देश कन्या पूजन के अनुष्ठान में लीन था, जब नन्ही बच्चियों के पैर पखार कर उन्हें देवी स्वरूप मानकर सात्विक भोजन कराया जा रहा था, ठीक उससे दो दिन पहले हजारीबाग के विष्णुगढ़ से आई एक खबर ने मानवता के कलेजे को छलनी कर दिया। एक ओर हम 'नारी सम्मान' का संकल्प ले रहे थे, तो दूसरी ओर समाज के बीच छिपे हवसी दरिंदों ने एक 12 वर्षीय मासूम की अस्मत और जिंदगी, दोनों को बेरहमी से कुचल दिया।
विष्णुगढ़ की यह घटना सामान्य अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक पतन की वह पराकाष्ठा है जिसे सुनकर रूह कांप जाती है। चैत्र नवरात्रि के षष्ठी की रात जब गांव 'मंगला शोभायात्रा' की भक्ति में सराबोर था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक अबोध बालिका, जो अपनी मां के साथ उत्सव देखने निकली थी, वह कभी घर नहीं लौटेगी। सप्तमी की सुबह जो मंजर सामने आया, उसने न केवल हजारीबाग बल्कि पूरे झारखंड को स्तब्ध कर दिया। उस मासूम की आंखें निकाल लेना, जीभ काट देना और उसके साथ की गई अमानवीय बर्बरता यह दर्शाती है कि समाज में कुछ ऐसे 'नरपिशाच' खुले घूम रहे हैं जिनके भीतर का मनुष्य पूरी तरह मर चुका है।
इस वीभत्स कांड पर राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिक्रियाएं भी कई सवाल खड़े करती हैं। जहाँ एक ओर झारखंड के मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित परिवार के साथ खड़े होकर प्रशासन पर त्वरित कार्रवाई का दबाव बनाया है, वहीं राज्य सरकार और जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों की अब तक की चुप्पी और पीड़ित परिवार से दूरी बनाए रखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। पुलिस की सक्रियता अपनी जगह है, लेकिन ऐसे 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामलों में जब तक शासन की ओर से कड़ा संदेश और संवेदनशीलता नहीं दिखती, तब तक पीड़ित न्याय की उम्मीद कैसे करे?
नवरात्रि में कन्याओं को देवी मानकर पूजना और फिर समाज में उन्हीं को असुरक्षित छोड़ देना, हमारे दोहरे चरित्र को उजागर करता है। वह 12 वर्षीय बच्ची एक ऐसे गरीब परिवार की उम्मीद थी जिसे समाज के भेड़ियों ने अपनी हवस की भेंट चढ़ा दिया। आज हर संवेदनशील नागरिक के मन में आक्रोश की ज्वाला धधक रही है। मांग केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसी कठोरतम सजा दिलाने की है जो भविष्य में किसी भी अपराधी की रूह कंपा दे। आज समय केवल विलाप करने का नहीं, बल्कि सामाजिक आत्म-मंथन का है। हमें सोचना होगा कि हमारी परवरिश और हमारे सामाजिक ढांचे में कहां कमी रह गई है कि एक मनुष्य हैवान बन जाता है। मां जगदंबा से यही प्रार्थना है कि वे समाज को वह 'सद्बुद्धि' दें जिससे बेटियों को केवल तस्वीरों और मूर्तियों में ही नहीं, बल्कि सड़क, स्कूल और घरों में भी साक्षात देवी जैसा सम्मान और सुरक्षा मिल सके। जब तक समाज की कुत्सित मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक हर नवमी पर किया जाने वाला कन्या पूजन महज एक रस्म बनकर रह जाएगा।
विष्णुगढ़ की इस मासूम का लहू समाज के दामन पर एक ऐसा दाग है जिसे केवल त्वरित न्याय और कठोरतम दंड से ही पोंछा जा सकता है। अब देखना यह है कि हजारीबाग प्रशासन और झारखंड सरकार कब तक इन दरिंदों को सलाखों के पीछे भेजकर समाज में न्याय का विश्वास बहाल करता है। हे माँ... इस समाज को वह दृष्टि दो, जहाँ कोई बेटी किसी हवसी भेड़िए का शिकार न हो और हर परिवार अपने घर की 'लक्ष्मी' को खोने के डर से मुक्त हो सके।
काश हर सुबह नवरात्रि की नवमी सी होती, हर किसी की नजर में बेटियां देवी सी होती... ।
