प्रस्तुति : रंजन चौधरी - सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र
हजारीबाग। पुलिस की वर्दी सिर्फ एक पोशाक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, अनुशासन, कानून के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति कर्तव्य का प्रतीक है। इसी वर्दी को पहनकर कई पुलिस पदाधिकारी अपनी सेवा पूरी करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनकी पहचान पद और वर्दी से आगे बढ़कर उनके व्यवहार, साहस, संवेदनशीलता और जनसेवा से बनती है। झारखंड पुलिस के इंस्पेक्टर सपन कुमार महथा ऐसे ही पुलिस पदाधिकारी हैं।
बोकारो जिले के चंदनकियारी की मिट्टी से निकलकर वर्ष 1994 बैच में बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर के रूप में सेवा शुरू करने वाले सपन कुमार महथा आज हजारीबाग जिले में सर्किल इंस्पेक्टर के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनके लंबे सेवाकाल में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी के साथ कम्युनिटी पुलिसिंग, मानवीय संवेदना और साहस के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं।
किसान परिवार में जन्म, संघर्षों के बीच पढ़ाई
सपन कुमार महथा का जन्म 11 सितंबर 1971 को चंदनकियारी प्रखंड के चंडीपुर गांव में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। उनके पिता धान और सब्जी की खेती करते थे, जबकि मां साझा में बकरी और बत्तख पालकर उनके अंडे बेचती थीं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी।
उन्होंने चंडीपुर प्राथमिक विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद मध्य विद्यालय चंदनकियारी और उच्च विद्यालय चंदनकियारी से पढ़ाई की। वर्ष 1986 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद बोकारो स्टील कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
उनके विद्यार्थी जीवन का एक प्रसंग उनके संघर्ष को बयां करता है। कॉलेज जाने के लिए साइकिल की जरूरत थी, लेकिन परिवार के पास इसके लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। तब उनकी मां ने साझा में मिले बकरी और बत्तख के अंडे बेचकर 100 रुपये में सेकंड हैंड साइकिल खरीदी। यही साइकिल उनके लिए केवल कॉलेज आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि सपनों की ओर बढ़ने का माध्यम बनी।
सात लाख के इनामी अपराधी की गिरफ्तारी से मिली पहचान
वर्ष 1994 में बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर के रूप में सेवा शुरू करने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग नालंदा जिले में हुई। सेवा के शुरुआती दौर में ही उन्होंने सात लाख रुपये के इनामी फरार अपराधी सूरजभान सिंह की गिरफ्तारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में सूरजभान सिंह राजनीति में आए और सांसद भी बने।
इसके बाद सपन कुमार महथा ने नालंदा, दुमका, स्पेशल ब्रांच, मुख्यमंत्री सुरक्षा, धनबाद, लातेहार, रांची और सीआईडी सहित विभिन्न महत्वपूर्ण स्थानों पर सेवाएं दीं। झारखंड गठन के बाद राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की मुख्यमंत्री सुरक्षा में भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई।
हजारीबाग में उन्होंने सदर थाना प्रभारी और विष्णुगढ़ थाना प्रभारी के रूप में भी कार्य किया। विष्णुगढ़ थाना प्रभारी रहते हुए नवादा में बालिका की नरबलि की चर्चित घटना के उद्भेदन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में वे पेलावल सर्किल इंस्पेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कोरोना काल में पुलिस की वर्दी ने दिखाया इंसानियत का चेहरा
सपन कुमार महथा के सेवाकाल का सबसे संवेदनशील अध्याय कोरोना संक्रमण का दौर रहा। उस समय वे रांची के बरियातू थाना प्रभारी के रूप में पदस्थापित थे। संक्रमण के भय के कारण लोग घरों से निकलने से डर रहे थे और अस्पतालों में मरीजों के परिजनों के सामने गंभीर संकट खड़ा था।
ऐसे समय में उन्होंने पुलिस की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर जरूरतमंदों की मदद का बीड़ा उठाया। मेडिकल सहायता, दवाइयां और भोजन उपलब्ध कराने के साथ करीब 98 दिनों तक थाना परिसर में जरूरतमंदों और मरीजों के परिजनों के लिए नि:शुल्क भोजनालय संचालित कराया।
कोरोना काल में रिम्स समेत अन्य अस्पतालों में कई मरीजों की मृत्यु हुई, जिनके परिजन समय पर अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंच सके। ऐसे मामलों में सपन कुमार महथा ने मृतकों को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दिलाने में भी सहयोग किया। देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से भी लोग उन्हें फोन कर अपने परिजनों के अंतिम संस्कार में मदद की गुहार लगाते थे।
कई मामलों में उन्होंने निजी खर्च और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से अंतिम संस्कार कराया। लॉकडाउन के दौरान धनबाद के कतरास में एक ही परिवार के छह सदस्यों की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार में सहयोग करना भी उनके मानवीय पक्ष का उदाहरण रहा।
नक्सल मुठभेड़ में दिखाया अदम्य साहस
सपन कुमार महथा की सेवा यात्रा केवल संवेदनशीलता ही नहीं, बल्कि साहस की भी मिसाल है। नेतरहाट क्षेत्र में नक्सलियों के साथ हुई एक मुठभेड़ के दौरान उनके करीब एक दर्जन साथी जवान संकट में थे। परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण थीं। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने भी उन्हें आगे नहीं जाने की सलाह दी थी और आर्मी फोर्स ने भी तत्काल वहां जाने से इनकार किया था।
इसके बावजूद सपन कुमार महथा अपने साथियों को संकट में छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने जोखिम उठाते हुए उनकी मदद के लिए आगे बढ़ने का फैसला किया। बाद में आर्मी फोर्स और अन्य पुलिस जवान भी वहां पहुंचे। मुठभेड़ में एक जवान शहीद हुआ, जबकि अन्य जवान सुरक्षित निकल सके।
कम्युनिटी पुलिसिंग को मानते हैं पुलिसिंग का अहम हिस्सा
सपन कुमार महथा पुलिसिंग को केवल अपराध और अपराधियों से निपटने तक सीमित नहीं मानते। आम लोगों से संवाद, पीड़ितों की सुनवाई और जरूरतमंदों की मदद को वे पुलिस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
जहां भी पदस्थापित रहे, उन्होंने लोगों से सीधे जुड़ने का प्रयास किया। जनप्रतिनिधियों, मीडिया, आम जनता और अपने सहकर्मियों के साथ समन्वय बनाकर काम करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है। कोरोना काल में रांची में बने उनके सामाजिक संबंध आज भी जरूरतमंद लोगों के काम आ रहे हैं।
जन्मभूमि से आज भी कायम है गहरा रिश्ता
लंबे पुलिस सेवाकाल और विभिन्न पदस्थापनाओं के बावजूद चंदनकियारी से उनका रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है। सहज, सरल, मिलनसार और मृदुभाषी स्वभाव के कारण वे अपने क्षेत्र के लोगों के बीच सहजता से घुल-मिल जाते हैं।
उनकी पत्नी सुषमा देवी बोकारो जिला परिषद की अध्यक्ष रह चुकी हैं और वर्तमान में जिला परिषद सदस्य हैं। उनकी बहन भी चंदनकियारी क्षेत्र से जिला परिषद सदस्य रह चुकी हैं। सामाजिक जीवन में सक्रियता और लोगों से जुड़ाव के कारण चंदनकियारी क्षेत्र में उनकी अपनी अलग पहचान बनी हुई है।
वर्दी की असली पहचान इंसानियत से
सपन कुमार महथा की सेवा यात्रा बताती है कि किसी पुलिस अधिकारी की पहचान केवल उसके पद, रैंक या पदस्थापना से नहीं होती। असली पहचान इस बात से होती है कि कठिन समय में उसने किसका साथ दिया, संकट में किसका हाथ थामा और कर्तव्य निभाते हुए कितनी बार स्वयं जोखिम उठाया।
एक किसान परिवार में जन्मे उस बच्चे की कहानी, जिसकी मां ने बकरी और बत्तख के अंडे बेचकर 100 रुपये में साइकिल खरीदी थी, आज संघर्ष, सफलता, साहस, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदना की कहानी बन चुकी है।
11 सितंबर को अपने जन्मदिन के अवसर पर इंस्पेक्टर सपन कुमार महथा को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। उनके स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना के साथ समाज और पुलिस सेवा के प्रति उनके समर्पण को सलाम।
