हजारीबाग। अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महोत्सव के चौथे दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य जन्मोत्सव की भक्ति में पूरी तरह सराबोर हो गए। प्रख्यात कथा वाचक मदन मोहन जी महाराज ने वामन अवतार, समुद्र मंथन तथा भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की अमृतमयी कथा का भावपूर्ण वर्णन करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का संदेश दिया।
महाराज जी ने अपने प्रवचन में कहा कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म, अन्याय और अत्याचार बढ़ता है, तब-तब भगवान अपने भक्तों की रक्षा तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए विभिन्न अवतार धारण करते हैं। वामन अवतार की कथा के माध्यम से उन्होंने राजा बलि के दान, समर्पण और विनम्रता का महत्व समझाया। वहीं समुद्र मंथन प्रसंग का वर्णन करते हुए देवताओं और असुरों के संयुक्त प्रयास से प्राप्त चौदह रत्नों का उल्लेख किया तथा जीवन में धैर्य, सहयोग, सकारात्मक सोच और निरंतर प्रयास की प्रेरणा दी।
कथा का सबसे आकर्षक और भावविभोर कर देने वाला क्षण भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का रहा। जैसे ही कथा में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रसंग आया, पूरा अग्रसेन भवन "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" के जयघोष और मधुर भजनों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने तालियों की गड़गड़ाहट, पुष्पवर्षा और हर्षोल्लास के साथ नंदलाल का जन्मोत्सव मनाया। भगवान श्रीकृष्ण की आकर्षक झांकी, भव्य श्रृंगार एवं मनमोहक सजावट ने पूरे पंडाल को मानो वृंदावन धाम का स्वरूप प्रदान कर दिया। श्रद्धालु भक्ति रस में डूबकर नृत्य करते और भजनों का आनंद लेते दिखाई दिए।
अपने प्रवचन में मदन मोहन जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन प्रेम, करुणा, सत्य, धर्म और मानवता की अनुपम शिक्षा देता है। यदि मनुष्य उनके आदर्शों और शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाए, तो उसका जीवन सुख, शांति और सदाचार से परिपूर्ण हो सकता है।
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने सामूहिक आरती में भाग लेकर भगवान श्रीकृष्ण से सुख, शांति, समृद्धि एवं लोककल्याण की प्रार्थना की। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह से पूरा अग्रसेन भवन भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।
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